हमें तय करना है, राष्ट्रहित सर्वोपरि है या निजस्वार्थ ..?

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अरुण श्रीवास्तव एवं ललित श्रीवास्तव की कलम से

आज विखंडन का माहौल बना हुआ है,पूरा देश मानो एक अंतः कलह से जूझ रहा है, लेकिन सिर्फ इसलिए की किसे कितना आरक्षण मिलना चाहिए,एक देश का एक तबका इस बात पर अड़ा है कि आरक्षण का आधार जातिगत न होकर आर्थिक होना चाहिए,और दूसरा तबका इस बात पर अड़ा है कि उन्हें जो आरक्षण दिया जा रहा है वह सही है,सारी बातें दो अलग-अलग विचारधाराओं की टकरार है,
इस विवाद के फैसले के बाद किसे क्या मिलेगा और क्या नहीं यह तो कह पाना बड़ा मुश्किल है,लेकिन कहीं न कहीं वर्तमान स्थिति को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इससे देश का फायदा नहीं अपितु नुकसान ही होना है,सनातन धर्म के अनुयायी आपस में भिड़कर ही वह गलती फिर से दोहरा रहे हैं,जो आज से लगभग 500 वर्ष पहले और 250 वर्ष पहले हमारे पूर्वज कर चुके हैं,इसी आपसी मुठभेड़ और लड़ाई के चलते हम लगभग 300 वर्ष मुगलों के और 200 वर्ष अंग्रेजों के गुलाम रहे हैं,और इतिहास गवाज है,
जब जब किसी आक्रांता द्वारा देश पर राज करने की मंशा बनाई गई है,तब-तब सबसे पहला कार्य यही किया गया है,की इस लकड़ी के भाड़े को छिन्न-भिन्न किस प्रकार किया जाये,कभी धर्म के नाम पर,कभी जाती के नाम पर,कभी जमीन के नाम पर तो कभी राजा के नाम पर,जब-जब हम आपस में लड़े तो गुलाम होकर गुमनामी के अँधेरे में चले गए,और जब-जब हम एक जुट होकर अन्याय और क्रूरता के खिलाफ लड़े तो आजाद कहलाये,आज विखंडन की स्थिति सर्वाधिक हिंदू धर्म में है,और यह भी सत्य है कि ऐंसे भी कई देश हैं
जहाँ सर्वाधिक हिंदुओं की संख्या हुआ करती थी,और आज वहाँ हिंदू अल्पसंख्यक हो गए,और आज भी देश के आठ राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक होने की कगार पर है, देश के 8 राज्य जहां हिंदू अल्पसंख्यक हैं. इनमें शामिल हैं जम्मू-कश्मीर यहां 28.44 प्रतिशत आबादी अल्पसंख्यक है. जबकि पंजाब में 38.40 प्रतिशत, लक्षद्वीप में 2.5 प्रतिशत, मिजोरम में 2.75 प्रतिशत, नगालैंड 8.75 प्रतिशत, मेघालय 11.53 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 29 और मणिपुर में 31.39 प्रतिशत हिंदू अल्पसंख्यक हैं।
इतनी बड़ी महासमस्या से जूझने के बाद भी हम आज यह नहीं समझ पा रहे की हमें तोड़कर फायदा किसका है,और आपस में लड़कर टूट जाने से नुकसान किसका है,आज जहाँ देखो लोग यही कहते नजर आते हैं,सरकार ने हमें क्या दिया,सरकार से हमे क्या मिला..?
तो इस बात को समझने के लिए हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के जीवन में घटित हुई एक घटना पर प्रकाश डालना चाहूँगा, एक हॉकी मैच के दौरान जब जर्मनी के तानाशाह हिटलर ने भारत के सपूत मेजर ध्यानचंद का खेल देखा तो वह उनके खेल का कायल हो गया,उन्होंने मैच के बाद मेजर ध्यानचंद को बुलाया और कहा कि आप बहुत अच्छा खेल खेलते हो लेकिन आपके देश ने आपको क्या दिया, मैं आपको जर्मन की सेना में नौकरी देता हूँ और भारत से 10 गुना ज्यादा पैसा भी दूँगा आप हमारी टीम से खेलिये, हिटलर के इस प्रस्ताव पर भारत के सच्चे सपूत मेजर ध्यानचंद ने जो जबाब दिया उसे सुनकर हर एक भारत वासी का सर गर्व से ऊँचा हो गया,
मेजर ध्यानचंद ने कहा”मिस्टर हिटलर यह मेरी जिम्मेदारी है कि मैं देश को क्या देता हूँ,और देश के लिए क्या कर सकता हूँ,न की मेरे देश की जिम्मेदारी है कि वह मेरे लिए क्या करता है,हिटलर को दिए गए मेजर ध्यानचंद ज जबाब ने एक बात तो साफ़ कर दी की देश की उन्नति,अखंडता,और सम्पन्नता से बढ़कर कुछ भी नहीं है,जब हम गुलाम हुआ करते थे तो सोचते थे,
की सुख,समृध्दि,घर परिवार सब कुर्बान हो जाये पर देश को आजादी मिलनी चाहिए,और आज जब हम आजाद हैं,तब अपने कुछेक निजस्वार्थ के लिए देश की अखंडता,और स्वाबलंबन को बेचने तैयार खड़े हैं,हम कहाँ से चले थे और आज कहाँ खड़े हैं यह विचारणीय है,विचारधाराओं की लड़ाई विचारों में ही होना चाहिए जिसके लिए देश का संविधान अधिकार देता है,लेकिन आपस में वैर न होने पाए,टकराव न होने पाए,क्योंकि यह हमें तय करना है,
राष्ट्रहित सर्वोपरि है या निजस्वार्थ.

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