सहज संवाद : मिटाना होगा देश की धरती से जयचन्दों का नाम-ओ-निशान

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सहज संवाद / डा. रवीन्द्र अरजरिया

देश, काल और परिस्थितियों के साथ सामंजस्य स्थापित करते हुए इस भू भाग में उत्सवों की एक अंतहीन श्रंखला है। सामाजिक समरसता के लिए वैदिक युग से ही इस परम्परा का निर्वहन किया जाता रहा है। सांस्कृतिक विरासत का वैभव समेटे हमारी मान्यतायें जीवन के विभिन्न पक्षों को एक साथ उजागर करतीं है।

सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग के कथानक वर्तमान में आस्था के केन्द्र बन गये हैं। प्रेरणादायक स्थानों ने तीर्थ का रूप ले लिया है। श्रद्धा, विश्वास और समर्पण की अनूठी दास्तानें जीवित जीवनियों के कृत्य से देखी जा सकतीं है। देश की सतरंगी आभा में आलौकित हो ही रहा था कि कालबेल का मधुर स्वर गूजने लगा। मुख्यद्वार खोलकर देखा तो चरणपादुका जनकल्याण सेवा समिति की पदाधिकारी मौजूद थे। सभी को आदरसहित ड्राइंगरूम में आमंत्रित किया।

उन्हें देखते ही हमें मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले त्रेताकालीन तीर्थ चरणपादुका का निमंत्रण पत्र याद आ गया जो एक सप्ताह पूर्व ही मिल गया था। अतीत की घटनायें वर्तमान में सजीव हो उठीं। दुर्गम इलाके में स्थापित तीर्थ, भगवान राम के चरणों के पत्थरों पर उभरे निशान, बजरंगवली का मंदिर, नदी की निर्मल धारा, चारों ओर घना जंगल, कटीली झाडियों सहित पूरा दृश्य किसी फिल्म की तरह चलने लगा।

पेडों के झुरमुट में जगह-जगह खडी बैलगाडियां, श्रद्धालुओं की भीड, मकरसंक्रान्ति स्नान पर्व पर डुबकी लगाते लोग, स्वाधीनता के मतवालों का जमावडा, उनके सामने मौजूद हजारों बुंदेलखण्डी आवाम, यहां स्वाधीनता से ओत-प्रोत भाषणों का दौर चल ही रहा था कि तभी घोडों की टापें गूंजने लगी। टीले और भीड को चारों ओर से घेर लिया गया। गोरी सरकार और उसके चन्द चाटुकार राजाओं की फौजों ने बंदूकें तान लीं।

सभा समाप्त कर नेतृत्व सम्हालने वालों को आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी गई। भीड ने देश-प्रेम के नारे बुलंद करना शुरू कर दिया। बुंदेली आवाम की एकता देखकर फिरंगी बौखला उठे। फायरिंग के आदेश दे दिये गये और देखते ही देखते लाशों पर लाशें गिरने लगीं। नदी की निर्मल धारा स्वाधीनता के मतवालों के खून से लाल हो गई। चारों ओर भगदड मच गई। चीख-पुकार का बाजार गर्म हो गया। देश के स्वाधीनता संग्राम में एक और जलियांवाला बाग प्रेरणा स्तम्भ बनकर खडा हो गया।

चरणपादुका तीर्थ पर मकरसंक्रान्ति पर्व पर हुई यह घटना पूरे क्षेत्र में आग की तरह फैल गई। घर-घर से सेनानी निकलने लगे। मातृभूमि को पराधीनता की बेडियों से मुक्त कराने वालों की टोलियां बनने लगीं। सार्थक परिणामों की दस्तक हुई। देश स्वतंत्र हुआ, गणतंत्र स्थापित हुआ, सरकारों के गठन हुआ। स्वाधीनता का इतिहास लिखा जाने लगा। पंजाब के जलियांवाला बाग को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय पहचान मिली परन्तु बुंदेलखण्ड का चरणपादुका तीर्थ की सहादत, क्षेत्रीय लोगों के सीमित संसाधनों तक ही सिमट कर रह गई।

वर्तमान में यहां मकरसंक्रान्ति पर्व पर चन्द स्थानीय लोगों के प्रयासों से एक श्रद्धांजिल समारोह आयोजित करके अमर शहीदों को याद कर लिया जाता है। इसी आयोजन का निमंत्रण पत्र भेजकर हमें भी आमंत्रित किया गया था। हमें विचार निद्रा में देखकर समिति के अध्यक्ष प्रभात तिवारी जी ने जगाते हुए कहा कि हम चाहते हैं कि एक लघु स्मारिका का प्रकाशन हो जाये। समिति के लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई से कुछ पैसे बचाकर शहीदों को शब्दांजलि देने का संकल्प लिया है।

स्मारिका में शासकीय सहयोग, जनप्रतिनिधियों की भागीदारी और कथित समाजसेवियों का योगदान पूछने पर समिति के सदस्यों ने एक दूसरे की ओर देखते हुए निराशाजनक उत्तर दिया। मन पीडा से भर गया। इस समिति में अधिकांश लोगों के परिजन स्वाधीनता संग्राम सेनानी रहे हैं। मुट्ठी भर लोगों का जज्बा देखकर उन्हें प्रणाम किया बिना नहीं रह सका। लघु स्मारिका का संपादन करने के निवेदन करते हुए समिति के सचिव शंकरलाल सोनी ने कहा कि अमर शहीदों की याद में इस क्रान्ति स्थल को राष्ट्रीय स्मारक घोषित करने हेतु स्वाधीनता के बाद से ही प्रयास किये जा रहे हैं।

विधायिका और कार्यपालिका द्वारा हर वर्ष घोषणायें हो जातीं हैं परन्तु आज तक इस दिशा में व्यवहारिक प्रगति नहीं हुई है। सचिव की बात पूरी होते ही अध्यक्ष ने कहा कि देश की धरती से मिटाना होगा जयचन्दों का नाम-ओ-निशान, तभी सम्मान के पात्रों को उचित स्थान और स्थानों को उचित पहचान मिल सकेगी। अगर गोरों के साथ चाटुकार राजा न होते तो देश गुलाम ही न होता और न होती चरणपादुका जैसे स्थानों पर सहादतें। स्वाधीनता के बाद भी देश में ऐसे जयचन्दों और चाटुकारों का बोलबाला स्पष्ट दिखाई दे ऱहा है। समिति के सदस्यों ने देश की सरकारों पर उपेक्षा बरतने की आरोप लगाते हुए कहा कि चुनावी माहौल में वायदों की अम्बार लग जाता है। परिणामों के बाद वे बादल हवा हो जाते हैं।

बात चल ही रही थी कि नौकर ने आकर स्वल्पाहार की प्लेटें तथा काफी के कप सेन्टर टेबिल पर सजाना शुरू कर दिये। चर्चा की सिलसिला थम गया। हमने सभी से सेन्टर टेबिल पर आना का निवेदन किया। स्वल्पाहार के बाद हमने उन्हें लघु स्मारिका के सम्पादन करने का आश्वासन दिया। सभी के चेहरों पर संतुष्टि के भाव स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। अन्य आवश्यक कार्यों की व्यस्तता का हवाला देते हुए उन्होंने विदा मांगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

Dr. Ravindra Arjariya
Accredited Journalist
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