मैं ‘मज़बूर’ मज़दूर क्या…? अधमरे मजदूरों को पूरा मार देंगी सरकारें….?

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मजदूरों को लेकर राज्यों के बीच तालमेल का अभाव

  • विजया पाठक

लॉकडाउन को दो माह बीत चुके हैं। इन दो माह में देश के 12 करोड़ मजदूर अभी भी दर-दर की ठोकरे खाने को मजबूर हैं। इरादों से बुलंद मजदूर अपनी बेबसी, लाचारी और कमजोरी के चलते अब राजनीति की भी भेंट चढ़ने लगा है। राज्यों की सीमाओं में फंसे इस प्रवासी मजदूरों की सुध तक नही ली जा रही है। राज्य सरकारें इन्हें बांटने पर तुली हुई हैं। जिसके परिणाम है कि दो माह बाद भी अपने घरों तक नहीं पहुँच पा रहे हैं।

सैकड़ों कि.मी. पैदल चलने के बाद भी राज्यों की सीमाओं पर फंसे हैं। प्रवासी मजदूरों को राज्यों में बांटकर नेताओं ने बेशर्मी की सारी हदें पार कर दी हैं। किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि एक दिन मजदूरों की बेबसी पर राजनीति हो सकती है। उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, मध्यप्रदेश, राजस्‍थान, गुजरात जैसे तमाम राज्य हैं जो मजदूरों के पलायन पर एक-दूसरों पर छींटाकशी कर रहे हैं। इन्हें एक बात समझनी चाहिए कि यह सिर्फ देश के निर्माणकर्ता भर हैं। अपने खून-पसीने और मेहनत से इन्हों ने देश को खड़ा किया है।

लेकिन विडम्बना ही है कि राजनेताओं के कारण आज इस लॉकडाउन में सबसे ज्यादा मजदूर वर्ग ही परेशान है। रोजी-रोटी तो छिनी ही अब इन्हें अपनी जन्म-भूमि भी नसीब नहीं हो पा रही है। बड़ी त्रासदी है कि राज्य सरकारें आपसी तालमेल के अभाव में इन्हें अपनाने में आना-कानी कर रही हैं। हर रोज हम इस मीडिया और सोशल मीडिया नेटवर्क पर मजदूरों की बेबसी की तस्वींरें देख रहे हैं। कोई मॉं अपने बच्चों को लेकर चल रही है तो कोई बेटा अपने मॉं-बाप को कंधों पर बिठाकर चल रहा है। तस्वीरें हमें बहुत बिचलित करती हैं। ताज्जुब है कि हमारी सरकारें इन तस्वीरों को देखकर भी पसीज नही रही है। इनकी मानवता और मानवीयता बिल्कुल मर चुकी है।

कोरोना काल में जो दुर्दशा मज़दूर की हुई है उससे सबकी आंखों में पानी उतर रहा है, गले में रुदन हो रही है। आज की स्थिति में लगभग 70% प्रवासी कामगारों के पास न पैसे हैं न काम हैं। वे घर जाना चाहते हैं। अकेले गुजरात में 30 लाख प्रवासी कामगारों ने घर वापसी का आवेदन कर रखा है पर 10% की भी जाने की व्यवस्था सरकार द्वारा नहीं की है बल्कि उनका मार्ग अवरुद्ध कर रखा है।

यही स्थिति कमोवेश सभी औधोगिक राज्यों की है। प्रवासी मज़दूर की दुर्दशा के लिए हमारी प्रतिक्रिया आज के भारत का पतन दर्शाती है, निचले वर्ग (गरीब मज़दूर) की असमानताएं, समाज के नैतिक मूल्यों की हानि, राजनीति का पक्षघात और विषाक्त मीडिया, क्या हम दूर नाइजीरिया में कुछ मानवीय संकटों पर प्रतिक्रिया कर रहे थे उससे खराब स्थिति तो भारत की है। तालाबंदी के कारण 12 करोड़ से अधिक व्यक्तियों को अचानक नौकरी से हाथ धोना पड़ा। इनमें से चार करोड़ से अधिक प्रवासी मजदूर हो सकते हैं। स्ट्रैंडर्ड वर्कर्स एक्शन नेटवर्क (स्वान) द्वारा चलाए जा रहे हेल्पलाइन नंबर पर कॉल के आधार पर एक सर्वेक्षण से उनकी स्थिति के बारे में पता लगता है। उनमें से 90 प्रतिशत को लॉकडाउन अवधि में किसी को भी वेतन का भुगतान नहीं किया गया है।

80 फीसदी को कोई राशन नहीं मिला है। नौकरी के बिना और भविष्य की आशा के बिना ये प्रवासी श्रमिक अब बस एक चीज़ चाहता है घर वापसी। जाहिर है, एक करोड़ से अधिक श्रमिकों ने अपने घरों में लौटने के लिए पंजीकरण किया है। सरकार की ओर से यह कहते हुए तालाबंदी शुरू हुई कि प्रवासी श्रमिक मौजूद नहीं थे। सरकार के मूल दिशानिर्देशों में उनके बारे में एक शब्द भी नहीं था। उन्हें केवल तभी देखा गया जब उनमें से लाखों ने सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलना शुरू किया। कैमरों को दिखाई देने वाली भीड़ को तितर-बितर कर इस समस्या का प्रबंधन किया गया। उनमें से कुछ को बसों में पैक किया गया, अन्य को अस्थायी राहत शिविरों में भेज दिया गया। किसी को भी यात्रा करने की अनुमति नहीं देने के सख्त आदेश जारी किए गए थे। वे रुके नहीं, लाखों ने चलना जारी रखा।

लेकिन वे टीवी की सुर्खियों में नहीं थे। उस समय पाकिस्तान और हिंदु लिंचिंग प्राइम टाईम मे चल रहा था। जिन लोगों की पहली चिंता की गई उनमें उत्तराखंड में फंसे गुजराती पर्यटक, वाराणसी में फंसे आंध्र के तीर्थयात्री, पंजाबी तीर्थयात्री, कोटा में पढ़ रहे मध्यवर्गीय बच्चे, विदेशी नागरिक जिन्हें विशेष फ्लाइट पकड़ने की जरूरत थी और निश्चित रूप से किसी बड़े या छोटे वीआईपी से संबंधित थे। वे संक्रमित हो सकते हैं; वास्तव में उनमें से कई संक्रमित निकले। अब भारतीय रेलवे ने 15 लाख प्रवासी मज़दूरों के लिये श्रमिक ट्रेनें चलायी। उसके लिये वे शाबासी ले रहे हैं। जबकि भारतीय रेलवे कोरोना काल से पहले 2 करोड़ लोगों का रोज परिवहन करती थी। इसी भारतीय रेलवे ने भूकंप के बाद नेपालियों के लिए भी मुफ्त ट्रेनें चलाईं थी। पर इस देश में गरीब मज़दूर की किसी ने चिंता नहीं की।

बात मध्य प्रदेश की तो पहले से अधमरे मजदूरों को इस लॉकडाउन के बाद पूरा मारा जा रहा है, मध्य प्रदेश के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र ने श्रम कानूनों में बदलाव किया गया। इसका एक महत्वपूर्ण भाग है वर्किंग ऑवर बढ़ाना। पहले श्रम कानून के हिसाब से हफ्ते में श्रमिक 6 दिन काम करता था और रोजाना 8 घंटे मतलब हफ्ते के 48 घंटे के बाद एक रेस्ट दिन होता था, जिसे बदलकर अब दिन के 12 घंटे रोज और हफ्ते के 72 घंटे कर दिया गया है। इस नये कानून की मूलभावना सामंतवादी प्रतीत होती है। एक तो पुराने कानून में संशोधन करते वक्त किसी मज़दूर संगठन से मंत्रणा नहीं की। कम से कम भारतीय मजदूर संघ जो कि‍ आर.एस.एस की सह्योगी संस्था है उसी से मंत्रणा कर लेते।

यह राज्यस सरकारों की बहुत बड़ी गलतफहमी है कि मजदूर किसी का नहीं है। यह वह वर्ग है जो सत्ताह परिवर्तन में अहम रोल अदा कर सकता है। जब मजदूर अपनी ताकत का इस्ते माल करता है तो सबको हिलाकर रख देता है। आज भले ही यह अपनी बेबसी, लाचारी के मारे शांत है, असहाय है लेकिन जब यह ताकतवर बनता है तो पसीने छुड़ा देता है। हमारी सरकारों को आज इनके हाल और हालात पर विशेष ध्यालन देना चाहिए क्योंनकि वर्तमान परिदृश्य में मजदूर बहुत बड़ी त्रासदी से गुजर रहा है। छोटे से प्रयास इन्हेंश खुशी दे सकते हैं।

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