आगर मालवा : मासूम हडडी यों पर सपनों का बोझ, परेशान हुआ बचपन

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TOC NEWS

आगर मालवा // TOC NEWS 
सुसनेर से ✍गिरिराज बंजारिया की रिपोर्ट
मो.9617717441
सुसनेर . भविष्य उज्ज्वल करने वाली पुस्तके ही अगर स्कूल बच्चो पर सितम ढाने लगे तो बच्चे उन पर ध्यान  कैसे लगा पाएगे| स्कूली सफर भारी भरकम बैग बच्चो के स्वास्थ पर प्रश्न चिन्ह लगा रहा है| बच्चो की पीठ पर क्षमता से अधिक वजन को चिकित्सक उनके स्वास्थ के लिए चिंताजनक बता रहे है| स्थति कुछ एसी हो गई है की किताबो का वजन बच्चो की उम्र के बराबर ही है| स्कूल शुरू होते ही बच्चो की पीठ पर बस्तो का बोझ लादना चिकित्सक स्वास्थ्य के लिए नुकसान दायक बता रहे है|
हम बात कर रहे है उन मासूम कंधों की जिनपर हर रोज किताबों का बोझ ढोया जा रहा है। जरूरत,उम्मीद और सपनों के बीच आखिर बचपन बस्ते के बोझ तले क्यों दबता जा रहा है। घर से बस्ते का बोझ लेकर निकलने वाला हर बच्चा एक बार जरूर सोचता है कि क्या उसमें मौजूद सभी सामग्रियों की आज उसे जरूरत है, निश्चित तौर पर नही। विघालय प्रबंधन और अभिभावकों का बच्चों से उम्मीदें पालना गलत नही है।

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सवाल यह कि आखिर तकनीक से लैस होती आधुनिक शिक्षण प्रणाली बस्ते के बोझ को कम क्यों नही कर पा रही है। यह तभी संभव है जब अभिभावकों के साथ विघयालय प्रबंधन सामूहिक तौर पर प्रयास करे और रणनीति बनाकर सकारात्मक पहल की ओर अग्रसर हो। बस्ते का बोझ कम करने के लिए विघयालयों व अभिभावकों को मिल कर विचार करना होगा। इस और न तो स्कूल प्रबंधन और न ही शिक्षा विभाग का कोई ध्यान है|

बच्चे पहले भी पढ़ते थे और उन्ही किताबो को पढकर वे बड़े-बड़े पदों पर आसिन है लेकिन वर्तमान में स्कूल अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने के लिए कई किताबे एसी संचालित कर रहे है| जिनका बच्चो के कोर्स से कोई लेना देना नहीं है| नन्हे मुन्हे बच्चे वजन उठाकर स्कूल की तरह निकलते है भारी भरकम बस्तो के वजन से न सिर्फ उन्हें मानसिक रूप से बल्कि शारीरिक पीड़ा से भी गुजरना पड़ता है|

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स्कूलो में नहीं खुलती अधिकाश पुस्तके भले ही बच्चे स्कूल में अपने साथ ढेर सारी पुस्तके लेकर जाते हे किन्तु स्कूल ले जाई गई अधिकांश पुस्तके स्कूल में प्रयोग ही नहीं हो पाती  है| कुछ शिक्षको के मुताबिक स्कूल में 5 या फिर 6 पुस्तके व उनसे संबंधित कापी पीरियड के अनुसार प्रयोग में लाई जाती है| जबकि अधिकांश पुस्तके व कापिया बच्चो दुवारा स्कूल में ले जाई जाती है| उनका प्रयोग ही नहीं किया
जाता है|
बच्चो के शारीरिक व मानसिक विकास पर विपरीत प्रभाव पड़ता है| कभी कभी बस्ते के वजन से बच्चे गिर भी जाते है| जिससे उन्हें चोट आ जाती है| ज्यादा वजन होने से बच्चो में सिरदर्द, पीठ दर्द, की समस्या हो जाती है| साथ ही कंधो पर भी असर पड़ सकता है| इस कारण बच्चो को भविष्य में कई गंभीर बीमारियों का शिकार होना पड़ सकता है|
डॉ बी.बी पाटीदार
बिएमओ सुसनेर

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शासन दुवारा एमपी बोर्ड व सि.बी.एस.ई पेटन की पुस्तके निर्धारित की है| इसके अलावा अपनी मन मर्जी से प्राइवेट स्कूल वाले निजी पुस्तके चला रहे हेतो हम वरिष्ट अधिकारी को अवगत कराएगे व इसकी जाच करेगे| जब बच्चा छोटा होता है तो ज्यादा किताबे का बोझ नहीं होना चाइये|
 केपी नायक
प्रभारी जिला शिक्षा अधिकारी आगर मालवा

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